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न्याय बनाम प्रक्रिया: क्या अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारी को न्याय का बोध होता है? लेखक की दृष्टि से एक विश्लेषणात्मक विमर्श

न्याय बनाम प्रक्रिया: क्या अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारी को न्याय का बोध होता है?
लेखक की दृष्टि से एक विश्लेषणात्मक विमर्श
भारत (इंडिया/भारत/हिंदुस्तान) का संविधान न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों पर आधारित है। संविधान की प्रस्तावना में “न्याय” शब्द सबसे पहले आता है। परन्तु आम नागरिक, अधिवक्ता और वादकारी के मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारी केवल प्रक्रिया (Procedure) का पालन कर रहे हैं या वास्तव में न्याय (Justice) का भी बोध रखते हैं?
यह प्रश्न विशेष रूप से तब तीखा हो जाता है जब किसी पक्ष द्वारा प्रस्तुत अर्जेंसी प्रार्थना पत्र, अंतरिम राहत आवेदन, महत्वपूर्ण दस्तावेज, नये साक्ष्य, या नाबालिग/महिला/वृद्ध व्यक्ति से जुड़ा संरक्षण आवेदन न्यायालय में लंबित रह जाता है, किन्तु उसी न्यायालय द्वारा किसी पूर्व आदेश के अनुपालन हेतु वारंट, कुर्की, वसूली, अथवा कारावास की कार्यवाही शीघ्रता से की जाती है।
1. न्याय और कानून में अंतर
कानून (Law) और न्याय (Justice) दोनों समानार्थी नहीं हैं।
कभी-कभी विधि की कठोर प्रक्रिया न्याय के मार्ग में बाधा बन जाती है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक बार कहा है कि:
“Procedure is the handmaid of justice and not its mistress.”
अर्थात प्रक्रिया न्याय की सेविका है, स्वामिनी नहीं।
यदि प्रक्रिया का उपयोग न्याय देने के बजाय न्याय टालने के लिए होने लगे तो न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है।
2. न्यायालयों में अर्जेंसी प्रार्थना पत्रों की वास्तविक स्थिति
व्यवहारिक रूप से देखा जाता है कि:
निवास संरक्षण के आवेदन महीनों लंबित रहते हैं।
घरेलू हिंसा मामलों में अंतरिम राहत समय पर नहीं मिलती।
भरण-पोषण के मामलों में त्वरित सुनवाई नहीं होती।
महत्वपूर्ण दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने के आवेदन लंबित रहते हैं।
साक्ष्य पुनः बुलाने (Recall) के आवेदन पर आदेश सुरक्षित रख लिया जाता है।
परन्तु दूसरी ओर:
वसूली वारंट
गिरफ्तारी वारंट
कुर्की आदेश
गैर-जमानती वारंट
पर अपेक्षाकृत शीघ्र आदेश पारित हो जाते हैं।
यहीं से वादकारी के मन में यह धारणा बनती है कि न्यायालय का ध्यान न्याय से अधिक आदेशों के अनुपालन पर है।
3. क्या न्यायिक अधिकारी की “Ego” न्याय पर हावी हो जाती है?
यह कहना उचित नहीं होगा कि सभी न्यायिक अधिकारियों में ऐसा होता है।
भारत में हजारों न्यायिक अधिकारी अत्यंत ईमानदारी और संवेदनशीलता से कार्य कर रहे हैं।
किन्तु कुछ मामलों में निम्न समस्याएँ दिखाई देती हैं:
(क) न्यायिक अहं (Judicial Ego)
जब कोई अधिवक्ता या पक्षकार बार-बार किसी त्रुटि की ओर संकेत करता है तो कभी-कभी उसे व्यक्तिगत चुनौती के रूप में ले लिया जाता है।
(ख) आलोचना सहन न करना
उच्च न्यायालयों ने कई बार कहा है कि:
“Judges are not infallible.”
न्यायाधीश भी मनुष्य हैं और उनसे भी त्रुटि हो सकती है।
किन्तु कुछ मामलों में अपने आदेश को गलत मानने के बजाय उसे हर हाल में बनाए रखने का प्रयास दिखाई देता है।
(ग) केस डिस्पोज़ल का दबाव
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा के अनुसार अधीनस्थ न्यायालयों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं।
ऐसी स्थिति में कई बार:
न्याय से अधिक फाइल निस्तारण (Disposal)
गुण-दोष से अधिक आंकड़ों (Statistics)
पर जोर दिखाई देता है।
4. क्या न्याय टालना भी अन्याय है?
सर्वोच्च न्यायालय का प्रसिद्ध सिद्धांत है:
“Justice delayed is justice denied.”
अर्थात विलंबित न्याय वास्तव में न्याय से वंचित करना है।
यदि:
किसी महिला को घर से निकाले जाने का खतरा है,
किसी बच्चे के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं,
किसी वृद्ध व्यक्ति की जीविका संकट में है,
और न्यायालय केवल अगली तिथि देता रहे, तो व्यावहारिक रूप से अधिकार समाप्त हो सकते हैं।
5. न्यायिक अधिकारियों के लिए उपलब्ध दिशानिर्देश
भारत में न्यायिक अधिकारियों पर अनेक संवैधानिक और नैतिक मानक लागू हैं।
(1) Restatement of Values of Judicial Life (1997)
यह भारत के न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता का आधार है।
मुख्य सिद्धांत:
निष्पक्षता
धैर्य
विनम्रता
पक्षकारों के प्रति सम्मान
व्यक्तिगत अहंकार से मुक्त निर्णय
(2) Bangalore Principles of Judicial Conduct
इनमें छह मूल सिद्धांत हैं:
Independence
Impartiality
Integrity
Propriety
Equality
Competence and Diligence
(3) संविधान का अनुच्छेद 14
समानता का अधिकार।
(4) संविधान का अनुच्छेद 21
निष्पक्ष और त्वरित न्याय का अधिकार।
(5) उच्च न्यायालयों की प्रशासनिक निगरानी
अनुच्छेद 235 के अंतर्गत अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण उच्च न्यायालय का है।
6. वर्तमान व्यवस्था में उपलब्ध उपचार (Remedies)
यदि किसी महत्वपूर्ण आवेदन पर विचार नहीं हो रहा हो तो:
(क) Mentioning Application
अत्यावश्यकता दर्शाते हुए शीघ्र सुनवाई का अनुरोध।
(ख) Reasoned Order की मांग
न्यायालय को कारणयुक्त आदेश देना चाहिए।
(ग) Revision / Appeal
जहां विधि अनुमति देती हो।
(घ) Article 227 Petition
उच्च न्यायालय की पर्यवेक्षणीय शक्ति।
(ङ) Writ Petition
यदि मौलिक या विधिक अधिकार प्रभावित हो रहे हों।
(च) Administrative Representation
जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के समक्ष प्रशासनिक शिकायत, किन्तु केवल न्यायिक आदेश से असहमति के आधार पर नहीं।
आवश्यक न्यायिक सुधार
1. अर्जेंसी आवेदन पर 72 घंटे में आदेश
कानून द्वारा अनिवार्य किया जाए कि:
निवास संरक्षण
घरेलू हिंसा
बच्चे के हित
वरिष्ठ नागरिक संरक्षण
से जुड़े अर्जेंसी आवेदन पर अधिकतम 72 घंटे में आदेश हो।
2. प्रत्येक आवेदन का डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम
जैसे RTI ट्रैक होती है वैसे:
आवेदन दाखिल
सुनवाई
आदेश
सब ऑनलाइन दिखाई दे।
3. आदेश सुरक्षित रखने की समय सीमा
किसी भी अंतरिम आवेदन पर:
15 दिन से अधिक आदेश सुरक्षित न रखा जाए।
4. वार्षिक मूल्यांकन में न्याय की गुणवत्ता
केवल निस्तारण संख्या नहीं बल्कि:
आदेश की गुणवत्ता
उच्च न्यायालय में टिकाऊपन
समयबद्धता
को भी मूल्यांकन का आधार बनाया जाए।
5. न्यायिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण
विशेषकर:
महिलाओं
बच्चों
वरिष्ठ नागरिकों
से जुड़े मामलों में।
6. “Case Management System”
प्रत्येक आवेदन की समय सीमा तय हो।
निष्कर्ष
भारत की न्यायपालिका लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। अधिकांश न्यायिक अधिकारी ईमानदारी से कार्य करते हैं, परन्तु यह भी सत्य है कि विलंब, अत्यधिक प्रक्रियात्मकता, केसों का बोझ और कुछ मामलों में न्यायिक अहंकार जैसी समस्याएँ न्याय की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
न्याय केवल आदेश पारित करने का नाम नहीं है। न्याय का अर्थ है—समय पर, निष्पक्ष, कारणयुक्त और प्रभावी राहत प्रदान करना।
यदि अर्जेंसी आवेदन महीनों लंबित रहें और केवल दंडात्मक आदेशों के पालन में तत्परता दिखाई दे, तो आम नागरिक के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास कम होना स्वाभाविक है।
इसलिए भविष्य का लक्ष्य केवल “Court of Law” नहीं, बल्कि “Court of Justice” होना चाहिए—जहाँ प्रक्रिया न्याय की सहायक बने, बाधक नहीं।
(The views expressed in this article are the personal views of senior advocate Girish Chandra Pokhariyal and UKnationnews is not responsible )

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