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डीआरडीओ ने स्वदेशी एचपीबीडी अपशिष्ट उपचार प्रौद्योगिकी का लाइसेंस डीएकी एक्सिस एनवायरनमेंट को किया हस्तांतरित

SUNIL NEGI

ग्वालियर/नई दिल्ली, जुलाई 2026

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान ग्वालियर ने मानव अपशिष्ट के सतत और विकेन्द्रीकृत उपचार के लिए विकसित अपनी स्वदेशी हाई परफॉर्मेंस बायोडाइजेस्टर प्रौद्योगिकी को उद्योग को हस्तांतरित कर दिया है। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए लाइसेंसिंग समझौता 25 मार्च 2026 को दिल्ली में एक समारोह में डॉ. मनमोहन परिदा, उत्कृष्ट वैज्ञानिक एवं निदेशक, डीआरडीई द्वारा डॉ. यूके सिंह, डीएस एवं महानिदेशक , डीआरडीओ की गरिमामय उपस्थिति में एम/एस डीएकी एक्सिस एनवायरनमेंट प्राइवेट लिमिटेड, फरीदाबाद को सौंपा गया। एम/एस डीएकी एक्सिस एनवायरनमेंट जापानी कंपनी एम/एस डीएकी एक्सिस जापान की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है।

समझौते के बाद डीएकी एक्सिस एनवायरनमेंट प्राइवेट लिमिटेड का एक वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल एचपीबीडी की तकनीकी जानकारी प्राप्त करने के लिए 6-7 अप्रैल 2026 को डीआरडीई ग्वालियर पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कंपनी के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री रियो वाजा ने किया। उनके साथ कंपनी के अन्य वरिष्ठ प्रतिनिधि श्री केसी पांडे और श्री कमल तिवारी भी उपस्थित थे। यात्रा के दौरान डीआरडीई ग्वालियर के बीपीटी प्रभाग के प्रमुख, वैज्ञानिक ‘जी’ डॉ. ए के गोयल ने एचपीबीडी पर विस्तृत तकनीकी प्रस्तुति दी।

इस अवसर पर उद्योग को तकनीकी सहयोग देने की प्रक्रिया भी शुरू हुई। उद्योग प्रतिनिधियों और डीआरडीई की एचपीबीडी तकनीकी टीम के बीच पहली समन्वय बैठक आयोजित की गई। डीआरडीई की टीम में डॉ. गोयल के अलावा डॉ. विजय पाल, डॉ. एमके मेघवंशी और डॉ. एनके त्रिपाठी शामिल थे। 7 अप्रैल 2026 को डॉ. मनमोहन परिदा ने श्री वाजा को एलएटीओटी दस्तावेज की प्रति सौंपकर क्षमता निर्माण और कार्यान्वयन प्रयासों की औपचारिक शुरुआत की।

डीआरडीओ ने बताया कि एचपीबीडी देश की पहली स्वदेशी प्रौद्योगिकी है जिसमें मानव अपशिष्ट के लिए अवायवीय, वायवीय और तृतीयक उपचार रणनीतियों को एक साथ जोड़ा गया है। हस्तांतरित प्रौद्योगिकी को वास्तविक परिस्थितियों में लागू कर मानव अपशिष्ट प्रबंधन और सतत स्वच्छता की चुनौतियों का समाधान किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार यह प्रणाली पर्यावरण प्रदूषण में कमी, सार्वजनिक स्वच्छता में सुधार, जल पुन: उपयोग और अपशिष्ट से संसाधन प्रबंधन में सहायक होगी। इससे स्वच्छ भारत मिशन, सर्कुलर इकोनॉमी और सतत विकास लक्ष्यों को भी बल मिलेगा।

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