Uttrakhand

उत्तराखंड में वन्यजीव-मानव संघर्ष बढ़ा, हमलों के डर से गांव छोड़ने को मजबूर हुए लोग, चारधाम सीजन में संकट गहराया

SUNIL NEGI

देहरादून, 27 जून 2026

चारधाम यात्रा के दबाव के बीच उत्तराखंड में तेंदुए, बाघ और भालू के हमलों में खतरनाक बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। पहाड़ के दूर-दराज गांवों से लेकर जंगल से सटे कस्बों तक लोग दहशत में हैं और कई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन-घर छोड़कर सुरक्षित जगहों पर पलायन करने को मजबूर हो गए हैं। पौड़ी, चमोली और अल्मोड़ा जैसे जिलों में लगभग हर हफ्ते गांव की सड़कों, स्कूलों के पास और यहां तक कि बाजारों के किनारे तेंदुए दिखने की खबरें आ रही हैं, जिससे घास लाने या बच्चों को स्कूल भेजने जैसे रोजमर्रा के काम भी जानलेवा जोखिम बन गए हैं। इसी कड़ी में चौबट्टाखाल ब्लॉक के संगलकोटी के पास कोलागढ़ पट्टी के सिख नेगी हलूण गांव से सटे एक गांव के बचे हुए सभी परिवारों ने जंगल और वन विभाग की ओर से सुरक्षा न मिलने के कारण अपना गांव हमेशा के लिए छोड़ दिया है।

सार्वजनिक बहस में उद्धृत सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 25 साल में उत्तराखंड में वन्यजीवों के हमलों में 900 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है, जिनमें से 200 से अधिक मौतें पिछले नौ साल में हुई हैं। इनमें अधिकांश तेंदुए और बाघ के हमलों से हुई हैं, जबकि भालू के हमले अपेक्षाकृत कम हैं। मृतकों में महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और युवा मजदूर शामिल हैं, जिन्हें रोजी-रोटी के लिए जंगल की सीमा में जाना पड़ता है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि राज्य सरकार की 10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि से तब कोई मदद नहीं मिलती जब घर का एकमात्र कमाने वाला चला जाए। ग्रामीण मुआवजे के बजाय हमलों की रोकथाम चाहते हैं।

नैनीडांडा, पोखरी और थराली जैसे इलाकों में पिछले हफ्तों में ग्रामीणों ने सड़कें जाम कीं और पंचायतें कीं। उनकी मांग है कि सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में तुरंत पिंजरे, कैमरा ट्रैप और त्वरित कार्रवाई दल तैनात किए जाएं, साथ ही चौबीस घंटे गश्त हो। कई ग्रामीणों का आरोप है कि वन एवं वन्यजीव विभाग की कार्रवाई धीमी और केवल घटना के बाद की है, जबकि हालात को वे “वन आपातकाल” बता रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधि बिगड़ते आवास को मुख्य कारण मान रहे हैं। उनका कहना है कि बेतरतीब पेड़ कटाई, सड़क चौड़ीकरण, जलविद्युत और सड़क परियोजनाओं के लिए सुरंग खुदाई, गर्मियों में बार-बार लगने वाली जंगल की आग और यात्रा के दौरान बढ़ा ट्रैफिक और भीड़ ने कोर जंगलों को कमजोर किया है, जिससे प्राकृतिक शिकार घटा और शिकारी मानव बस्तियों की तरफ आए हैं।

वन विभाग का कहना है कि इस सीजन में पिंजरे और रैपिड रिस्पांस टीमें बढ़ाई गई हैं और नरभक्षी घोषित होने पर ही शूटर की मदद ली जाती है। अतीत में जॉय हुकिल जैसे विशेषज्ञों को भी बुलाया गया है। विभाग ने सुबह-शाम अकेले जंगल न जाने और तेंदुआ दिखने पर तुरंत सूचना देने की सलाह भी दोहराई है। विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि ग्रामीण बाजारों में शराब की दुकानें तेजी से खुल रही हैं, लेकिन वन्यजीव सुरक्षा पर कार्रवाई में देरी हो रही है। सरकार का कहना है कि राजस्व और वन्यजीव प्रबंधन दोनों साथ-साथ चल रहे हैं और मुआवजे के नियम हाल में बढ़ाए गए हैं।

मानसून से पहले तेंदुओं की गतिविधि और बढ़ने की आशंका है। ग्रामीणों की तत्काल मांग है कि ज्यादा पिंजरे लगें, संवेदनशील गांवों और स्कूलों के चारों ओर सोलर फेंसिंग हो, घास लाने के लिए सुरक्षित जोन बनें और आपातकालीन हेल्पलाइन तुरंत काम करे। लंबे समय में वे जंगल बहाली, वन्यजीव कॉरिडोर में परियोजनाओं पर कड़ी निगरानी और जंगल के अंदर शिकार आधार बेहतर करने की मांग कर रहे हैं। वन विभाग ने उच्च स्तरीय समीक्षा और सबसे प्रभावित ब्लॉकों में अतिरिक्त तैनाती का ऐलान किया है, लेकिन जंगल की सीमा पर बसे गांवों और पहले ही विस्थापित हो चुके परिवारों के लिए सवाल यही है कि आखिर कब तक वे इस डर के साथ जीएंगे और कब तक एक ठोस योजना से जानें बचेंगी।

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