एनएफआईडब्ल्यू सहित विभिन्न संगठनों ने बढ़ते महिला अपराध, पितृसत्तात्मक व्यवस्था और बाल तस्करी जैसे मुद्दों पर जताई चिंता

नई दिल्ली
आज 8 मार्च है, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, जिसे विश्वभर में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन दुनिया भर की महिलाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने और उनके अथक परिश्रम, निरंतर संघर्ष, समर्पण, प्रतिबद्धता, दृढ़ता तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में किए गए योगदान और बलिदान को मान्यता देने के लिए मनाया जाता है।चाहे वह रक्षा बलों में हों, लड़ाकू के रूप में, खिलाड़ी, अंतरिक्ष यात्री, वकील, न्यायाधीश, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ, कलाकार, अभिनेत्री, लेखिका या साहसी पत्रकार—इन सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों के बराबर और कई बार उनसे भी आगे बढ़कर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली सैकड़ों महिलाओं के उदाहरण मौजूद हैं।
हालांकि 21वीं सदी में भी अनेक महिलाएं ऐसी हैं जो दमन, उत्पीड़न और यातनाओं का शिकार हैं तथा प्रचलित पितृसत्तात्मक व्यवस्था से बाहर निकलकर अपने अधिकारों और बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष कर रही हैं।
जहां एक ओर सत्ताधारी राजनीतिक दल और उनके विभिन्न संगठन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को बड़े आयोजनों और भारी खर्च के साथ मनाते हैं, वहीं भारत सहित कई विकासशील देशों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं बुनियादी अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष कर रही हैं। भारत ने जीवन के कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है और महाशक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा भी की है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं—जो वास्तविक भारत की प्रतिनिधि हैं—अब भी दमन, उत्पीड़न और गरीबी का सामना कर रही हैं और पारंपरिक बंधनों से मुक्त होकर उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
महिलाओं के साथ बलात्कार, जन्म से पहले ही बच्चियों की हत्या और बलात्कार के बाद मासूम बच्चियों की बेरहमी से हत्या जैसी घटनाओं के सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं।
2012 में वसंत विहार में चलती बस में निर्भया के साथ हुई दरिंदगी, नजफगढ़ की किरण नेगी और उत्तराखंड की अंकिता भंडारी जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
हाल ही में एपस्टीन फाइल्स का मामला, जिसने दुनिया भर का ध्यान खींचा, ने सभी को शर्म से सिर झुकाने पर मजबूर कर दिया। इस मामले में कई शीर्ष राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों द्वारा नाबालिग किशोरियों के साथ किए गए घिनौने कृत्यों का खुलासा हुआ।
यदि ऐसे शर्मनाक और घिनौने कृत्य उन देशों में भी होते हैं जो स्वयं को महाशक्ति होने का दावा करते हैं और वहां के राजनेता इस प्रकार के यौन अपराधों में बेनकाब हो जाते हैं, तो वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के वास्तविक महत्व पर भी सवाल खड़े होते हैं।
हालांकि दिल्ली और अन्य स्थानों पर कई संगठन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को बड़े आयोजनों और कार्यक्रमों के माध्यम से मना रहे हैं, वहीं कुछ राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन दिल्ली की सड़कों, विशेषकर जंतर-मंतर पर, हाथों में तख्तियां लेकर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं। इन प्रदर्शनों में महिलाओं के अधिकारों, बढ़ते बलात्कार, बालिका एवं बाल तस्करी, महिलाओं की सुरक्षा और पितृसत्तात्मक वर्चस्व जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया गया।
नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन (एनएफआईडब्ल्यू) दिल्ली राज्य के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस सड़कों पर भी उत्साह के साथ मनाया गया। इसका आयोजन एनएफआईडब्ल्यू दिल्ली राज्य सहित विभिन्न महिला संगठनों द्वारा किया गया।
एनएफआईडब्ल्यू की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सैयदा हामिद ने महिला सभा को संबोधित किया। कार्यक्रम का नेतृत्व एनएफआईडब्ल्यू दिल्ली राज्य की सचिव अलका श्रीवास्तव के साथ शारदा देवी, शीला, रेहाना खातून, अर्चना, सजदा बेगम, पुष्पा और दीप्ति आदि ने किया।
इस अवसर पर उत्साही महिला कार्यकर्ताओं ने क्रांतिकारी गीत प्रस्तुत किए। महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा पुरुष नेता भी कार्यक्रम में उपस्थित थे, जिनमें प्रमुख रूप से सीपीआई दिल्ली राज्य के सचिव और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य प्रो. दिनेश वर्शनी तथा सीपीआई दिल्ली राज्य के सचिवालय सदस्य शंकरलाल शामिल थे।





