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डॉ आंबेडकर चेयर दून विश्वविद्यालय और वीर चंद्र सिंह गढ़वाली औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में संगोष्ठी का आयोजन


रानीचौरी/देहरादून: दून विश्वविद्यालय देहरादून की ‘डॉ. अंबेडकर चेयर’ और वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय द्वारा “भारतीय कृषि, भूमि सुधार और टिकाऊ ग्रामीण विकास पर डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दृष्टिकोण” विषयक सेमिनार आयोजित किया गया। संगोष्ठी में शिक्षाविदों, कृषि वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और सामाजिक नीति विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया है कि कृषि की आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए ऐसे गहरे वैचारिक ढांचे की आवश्यकता है, जो आर्थिक व्यवहार्यता और सामाजिक समानता को जोड़ते हों, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक बदलाव लाया जा सके। विशेषज्ञों ने बताया कि कैसे डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दृष्टिकोण भारत के प्राथमिक क्षेत्र यानि कृषि क्षेत्र के संरचनात्मक संकटों को हल करने में मदद कर सकता है। जिससे आज की कृषि समस्याओं के समाधानों खोजने एवं हाशिए पर मौजूद समुदायों के उत्थान के लिए भूमि स्वामित्व, संस्थागत ऋण प्रणालियों और संसाधनों के वितरण में व्यापक पुनर्गठन कैसे किया जा सकता है।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता कलकत्ता विश्वविद्यालय में ‘डॉ. बी.आर. अंबेडकर चेयर’ के प्रोफेसर सुब्रत शंकर बागची ने 1918 में लिखे गए डॉ. अंबेडकर के उस महत्वपूर्ण शोध पत्र पर ध्यान केंद्रित किया, जिसमें भारत में छोटी जोत और उनके समाधानों पर चर्चा की गई थी। प्रोफेसर बागची ने स्पष्ट किया कि डॉ. अंबेडकर के अनुसार, भूमि के छोटे टुकड़ों में बंट जाना केवल आकार की समस्या नहीं थी, बल्कि यह उत्पादन के कारकों के असंतुलित मिश्रण की समस्या है यानी, उपलब्ध पूंजी और भूमि की तुलना में श्रम की अधिकता है । उन्होंने बताया कि डॉ. अंबेडकर ने औद्योगीकरण पर इसलिए जोर दिया था ताकि भूमि पर जनसंख्या का भारी दबाव कम हो सके, जिससे कृषि एक कुशल, लाभदायक और अधिशेष पैदा करने वाला क्षेत्र बन सके।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो एस.पी. सती ने उपस्थित सभी गणमान्य लोगों का स्वागत करते हुए डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों पर अकादमिक चर्चा और अध्ययन के गहरे महत्व को रेखांकित किया। प्रो. सती ने बताया कि जहाँ डॉ. अंबेडकर को भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता के रूप में विश्व स्तर पर सम्मान प्राप्त है, वहीं एक संस्थागत अर्थशास्त्री के रूप में उनके क्रांतिकारी योगदान आज भी कृषि, सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और ग्रामीण परिवर्तन से जुड़े आधुनिक संकटों को सुलझाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

शैक्षणिक सिद्धांतों और ज़मीनी राजनीतिक क्रियान्वयन के बीच की दूरी को पाटने के लिए समर्पित टिहरी के विधायक और पूर्व मंत्री श्री किशोर उपाध्याय ने तर्क दिया कि आधुनिक दौर में टिकाऊ ग्रामीण विकास के लिए दोहरी रणनीति की आवश्यकता है: सरकारी समर्थन वाले बुनियादी ढांचे के माध्यम से छोटे किसानों को सशक्त बनाना और संस्थागत बाधाओं को दूर करना। उत्तराखंड की विशिष्ट चुनौतियों पर चर्चा करते हुए, डॉ. उपाध्याय ने बताया कि पलायन, पर्वतीय क्षेत्रों की नाज़ुक पारिस्थितिकी और बिखरी हुई ज़मीन की जोतें खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए खतरा बनी हुई हैं। उन्होंने शैक्षणिक और वैज्ञानिक समुदाय से आग्रह किया कि वे डॉ. अंबेडकर के दूरदर्शी आर्थिक ढांचे से प्रेरणा लें और ऐसी विकेंद्रीकृत, समुदाय-आधारित नीतियां बनाएं, जो पहाड़ी क्षेत्रों की कृषि अर्थव्यवस्था में बदलाव ला सकें।

दून विश्वविद्यालय के’डॉ. बी. आर. अंबेडकर चेयर’ प्रोफेसर डॉ हर्ष डोभाल ने सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के व्यापक सशक्तिकरण में डॉ. अंबेडकर के व्यवस्थित योगदान पर विशेष रूप से प्रकाश डाला। प्रो. डोभाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि डॉ. अंबेडकर ने कृषि को केवल एक तकनीकी या व्यावसायिक उद्यम मानने के बजाय, इसे राजनीतिक अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचनाओं के नज़रिए से देखा। उन्होंने ज़मीन और जाति के बीच के गहरे संबंध को स्पष्ट करते हुए बताया कि भारत में ग्रामीण आजीविका किस तरह सामाजिक पदानुक्रम से जुड़ी है; जहाँ ज़मीन का मालिकाना हक सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक प्रभुत्व का मुख्य साधन बन जाता है, जिससे अक्सर हाशिए पर रहने वाले समूह भूमिहीनता के दुष्चक्र में फंस जाते हैं। इस अवसर पर डॉ. पंकज लाल ने समकालीन कृषि और ग्रामीण विकास के मुद्दों के संदर्भ में डॉ. अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता पर चर्चा की। उन्होंने ग्रामीण समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए संसाधनों के समान वितरण, संस्थागत समर्थन और समावेशी नीतियों के महत्व को रेखांकित किया।
डॉ. सचिन कुमार ने कृषि विकास के साथ सामाजिक समानता को जोड़ने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने ग्रामीण असमानताओं को दूर करने और आजीविका के अवसरों को बेहतर बनाने में शिक्षा, जागरूकता और उचित विकास कार्यों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
डॉ. अंकित टम्टा ने टिकाऊ ग्रामीण विकास के महत्व और उभरती चुनौतियों का सामना करने में डॉ. अंबेडकर के सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने ऐसे समावेशी दृष्टिकोणों की आवश्यकता पर जोर दिया, जो वंचित समुदायों की जरूरतों को पहचानें और अवसरों तथा संसाधनों तक समान पहुंच को बढ़ावा दें।
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के एसोसिएट डायरेक्टर शोध प्रो. अमोल वशिष्ठ ने कार्यक्रम की कार्यवाही का सारांश प्रस्तुत किया, समापन भाषण दिया और धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में विशिष्ट वक्ताओं, विश्वविद्यालय के अधिकारियों, फैकल्टी सदस्यों, शोधकर्ताओं, छात्रों और आयोजन टीमों के योगदान को सराहा। उन्होंने डॉ. अंबेडकर के विचारों और आज की विकास संबंधी चुनौतियों के समाधान में उनके अनुप्रयोग पर अकादमिक चर्चा जारी रखने के महत्व पर जोर दिया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. अतुल कुमार ने किया, जिन्होंने पूरी कार्यवाही का समन्वय किया और विभिन्न सत्रों को सुचारू रूप से संपन्न कराया। डॉ. पंकज ठाकुर और डॉ. वैष्णवी उनियाल ने रिपोर्टर की भूमिका निभाई और सेमिनार की मुख्य चर्चाओं और महत्वपूर्ण बिंदुओं को दर्ज किया। डॉ. विपिन कुमार ने कार्यक्रम के तकनीकी पहलुओं का समन्वय किया। देश के विभिन्न हिस्सों से आए अन्य वक्ताओं और शोधार्थियों ने तकनीकी सत्रों के दौरान अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इनमें डॉ. अंबेडकर के सिद्धांतों को लागू करते हुए आज के कृषि संकटों पर चर्चा की गई, जिसमें पहाड़ी कृषि में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन, पारदर्शी शासन के लिए डिजिटल भूमि रिकॉर्ड, और कृषि कार्यों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी जैसे मुद्दे शामिल थे। उन्होंने सामूहिक रूप से तर्क दिया कि सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कृषि योजनाओं का मूल्यांकन ‘सामाजिक न्याय’ के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि महिलाओं और हाशिए पर मौजूद किसानों को ऋण तक समान पहुंच मिले और उन्हें अपनी भूमि पर सुरक्षित अधिकार प्राप्त हों।
सेमिनार में दून विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय की ‘डॉ. बी. आर. अंबेडकर चेयर’ से जुड़े प्रतिनिधियों, फैकल्टी सदस्यों, शोधकर्ताओं और छात्रों सहित 200 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

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