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एआरएस एंटरप्राइजेज प्रोडक्शन की गढ़वाली फिल्म ‘मारच्छा’ अखिल भारतीय प्रीमियर के लिए तैयार

SUNIL NEGI


रोहित शर्मा द्वारा निर्मित और अनुभवी फिल्म निर्माता शिव नारायण सिंह रावत द्वारा निर्देशित एवं लिखित इस फिल्म में सफलता के सभी तत्व मौजूद हैं और यह निश्चित रूप से ब्लॉकबस्टर बनेगी, क्योंकि उनकी पिछली गढ़वाली फिल्म ‘बाउल्या काका’ ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की थी।

आज देहरादून प्रेस क्लब में पत्रकारों, थिएटर कार्यकर्ताओं, फिल्म प्रेमियों, फिल्म के सभी कलाकारों और निर्माता एवं निर्देशक सहित क्रू सदस्यों की उपस्थिति में ‘मारच्छा’ का पोस्टर और ट्रेलर जारी किया गया।

‘मारच्छा’ के निर्देशक और पटकथा लेखक शिव नारायण सिंह रावत ने हाल ही में पूर्व एयर वाइस मार्शल (वीएसएम) राजेश भंडारी द्वारा निर्मित अपनी एक अन्य गढ़वाली फिल्म ‘कंडाली’ की शूटिंग पौड़ी गढ़वाल जिले के शांत और सुंदर स्थानों पर मात्र पंद्रह दिनों में पूरी की है।

मारच्छा’ उत्तराखंड और उसके लोगों की भलाई के लिए एक अनूठा सामाजिक-सांस्कृतिक संदेश देती है, जिसका अधिकांश दृश्य सीमावर्ती गाँव और उसके आसपास के खूबसूरत स्थानों पर फिल्माया गया है। उनकी अगली फिल्म ‘कंडाली’ भी उत्तराखंड के गाँवों में वापसी और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है, जिसमें वनों की कटाई के खिलाफ लड़ाई भी शामिल है।

फिल्म में कंडाली को एक पौष्टिक सब्जी के रूप में दर्शाया गया है, साथ ही उन लोगों के लिए कठोर संदेश भी है जो कानूनों का उल्लंघन करते हैं और उत्तराखंड, उसके पर्यावरण और सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के हितों के खिलाफ काम करते हैं।
‘मारच्छा’ का सामाजिक टैग ‘अंत-योदया’ है।

कहानी का मुख्य पात्र लक्ष्य इस अवधारणा से गहराई से प्रभावित है और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में एक करोड़ के वेतन पैकेज को ठुकराकर व्यक्तिगत लाभों की परवाह नहीं करता। इसके बजाय, वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर गांव और उसके लोगों की भलाई के लिए कृषि जैसे स्वदेशी साधनों के माध्यम से बेहतर लाभ प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत और लगन से काम करना शुरू कर देता है।

वह अपनी वैज्ञानिक पद्धति को कारगर साबित करने की पूरी कोशिश करता है, लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था उसका साथ नहीं देती और उसे दरकिनार कर दिया जाता है। तब वह भूख हड़ताल पर बैठने का फैसला करता है और धीरे-धीरे उसके सभी दोस्त, यहां तक ​​कि फिल्म का खलनायक भी, जो पहले उसके और उसके हर कदम के खिलाफ था, साथ ही परिवार के सभी सदस्य और गांववाले उसका खुलकर समर्थन करते हैं।

वह भ्रष्ट व्यवस्था के समक्ष घोषणा करता है कि यह असहयोग आंदोलन उत्तराखंड के युवाओं के हित में नहीं है… फिल्म के अंत में लक्ष्य की जीत होती है और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का सुशासन अंततः उसकी सभी मांगों को मान लेता है, और कृषि मंत्री उसे सफलता का रस पिलाकर उसका अनशन तुड़वाते हैं। सभी प्रसन्न हो जाते हैं और उत्तराखंड में विकास होता है। फिल्म का समापन होता है।

बधाई हो!

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