Uttrakhand

उत्तराखंड को संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत लाना क्यों आवश्यक है?

ANOOP BISHT

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र को संविधान की 5वीं अनुसूची(5th Schedule&Tribe Status) में शामिल करना।
ध्यान देने योग्य है कि भारत के सभी 12 पर्वतीय राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों के मूल निवासी समुदायों को Tribe Status प्राप्त है, फिर केवल गढ़वाली–कुमाऊँनी समुदायों के साथ ही भेदभाव क्यों?
हाल ही में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी समुदाय और गद्दी ब्राह्मणों को Tribe Status दिया है।
वहीं उत्तराखंड में नेपाली समुदाय, वन गुर्जर (मुस्लिम समुदाय) तथा 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से आए लोगों को भी आरक्षण देने की तैयारी चल रही है।
यदि इन समुदायों को Tribe Status दिया जा सकता है, तो फिर उत्तराखंड के मूल निवासियों को इससे वंचित क्यों रखा गया?
10 दिसंबर 2025 को भारत सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया है कि अब राज्य सरकार को एक विधेयक पारित कर जनजातीय दर्जे की माँग का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजना अनिवार्य है।
ऐतिहासिक दस्तावेज: गढ़वाल और कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों
ऐतिहासिक दस्तावेज: गढ़वाल और कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्र
ब्रिटिश काल में भारत के अनेक क्षेत्रों को उनकी विशिष्ट ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रशासनिक संरक्षण प्रदान किया गया था। इसी क्रम में देश के कुछ जनजातीय एवं पर्वतीय क्षेत्रों को सन् 1815 से 1874 के बीच “Non-Regulation Area” घोषित किया गया, ताकि उन्हें सामान्य ब्रिटिश भारतीय प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे से अलग रखा जा सके।
इन क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा विशेष प्रावधान लागू किए गए थे, जो सामान्य (Regulated) प्रांतों से भिन्न थे। तत्कालीन संयुक्त प्रांत (बाद में उत्तर प्रदेश) के गढ़वाल और कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों को भी उनकी जनजातीय, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक विशिष्टता के आधार पर विशेष क्षेत्र माना गया था।
इसी संदर्भ में यहाँ सन् 1874 से 1950 तक Scheduled Districts Act 1874 के प्रावधान लागू रहे, जिसके अंतर्गत इन पर्वतीय क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक व्यवस्था के तहत संचालित किया जाता था।
इन Non-Regulation Area & Scheduled Districts Act 1874 में सामान्य ब्रिटिश कानून और नियम पूरी तरह लागू नहीं किए जाते थे। इसके बजाय, स्थानीय शासकों, जनजातीय नेताओं या विशेष आयुक्तों को प्रशासनिक अधिकार दिए गए थे। इन क्षेत्रों में गवर्नर-जनरल या उनके अधीनस्थ अधिकारियों को व्यापक शक्तियाँ दी गई थीं ताकि वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रशासन चला सकें।
सन् 1874 तक गढ़वाल और कुमाऊँ में Schedule District Act, 1874 के तहत जनजातीय कानून लागू थे। नीचे दिए गए कानून इसी अधिनियम की नियमावली के अंतर्गत आते थे, जैसे;
कुमाऊँ वन पंचायत अधिनियम, 1931: इसने पर्वतवासियों को स्थानीय वनों से रोजगार का अधिकार दिया था, परंतु 1974 में इस कानून को उत्तर प्रदेश वन अधिनियम के अंतर्गत लाकर अधिकांश अधिकार उनसे छीन लिए गए।

कुमाऊँ पुलिस अधिनियम, 1916: गढ़वाल-कुमाऊँ क्षेत्र के जनजातीय पर्वतीय इलाकों में सामान्य पुलिस व्यवस्था लागू नहीं थी। स्वतंत्रता-पूर्व काल से 1974 तक कानून-व्यवस्था, अपराधों की प्रारंभिक जाँच, रिपोर्टिंग तथा राजस्व से संबंधित पुलिसीय अधिकार पटवारियों के पास निहित थे। ऐसी विशेष प्रशासनिक व्यवस्था केवल जनजातीय क्षेत्रों में ही देखने को मिलती है।
यही व्यवस्था आज के संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची का आधार मानी जाती है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सन् 1952 से 2000 तक पर्वतीय समुदायों को उच्च शिक्षा में 6% आरक्षण प्राप्त था, जिसे राज्य गठन के समय वर्ष 2000 में समाप्त कर दिया गया।
गढ़वाली–कुमाऊँनी समुदाय: Tribe दर्जे के पात्र
विशेष भौगोलिक स्थिति:
पर्वतीय क्षेत्र का लगभग 80% हिस्सा वन क्षेत्र है, जो यहाँ के समुदाय को Tribe दर्जा प्राप्त करने का स्वाभाविक आधार प्रदान करता है।
पिछड़ापन:
अधिकांश पहाड़ी परिवारों के पास आधा एकड़ से भी कम भूमि बची है, जिससे वे भूमिहीन या सीमांत किसान की श्रेणी में आते हैं। स्कूल, कॉलेज और अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाएँ आज भी नदारद हैं। बेरोजगारी के कारण लगभग 70% लोग पलायन कर चुके हैं।
विशिष्ट संस्कृति और आदिम लक्षण:
उत्तराखंड का जनमानस प्रकृति-पूजक है। फूलदेई, खतड़ुवा, इगास-बग्वाल, हलिया दशहरा, रम्माण, हिलजात्रा जैसे त्योहार; कठपतिया, ऐपण कला, बलि प्रथा, जादू-टोना, जागर जैसी परंपराएँ; और वनों पर आधारित आजीविका यहाँ की जनजातीय जीवनशैली को दर्शाती हैं। कृषि आज भी पूरी तरह आदिम पद्धति पर आधारित है बिना मशीनों, सिंचाई-सुविधाओं या रासायनिक खाद के। खेती मौसम पर निर्भर है और बैलों या मनुष्यों द्वारा हल खींचकर की जाती है। भूमि सामुदायिक गोल खाता प्रणाली के तहत चली आती है। ये सभी लक्षण उत्तराखंड को जनजातीय दर्जे का स्वाभाविक हकदार बनाते हैं।
खस जनजाति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह सर्वविदित है कि ऐतिहासिक दृष्टि से यह क्षेत्र खसों की कर्मभूमि रहा है।
डॉ. लक्ष्मी दत्त जोशी ने 1929 में लंदन विश्वविद्यालय से अपने पीएचडी शोधग्रंथ “Khas Family Law” (Government Press, United Provinces) में खसों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रमाणिक तथ्य प्रस्तुत किए। यह ग्रंथ कई वर्षों तक न्यायालयों में संदर्भग्रंथ के रूप में प्रयुक्त हुआ। उन्होंने उत्तराखंड के लगभग 80% निवासियों को खस बताया है।
इतिहासकार बद्रीदत्त पांडे (कुमाऊँ का इतिहास) और डॉ. लक्ष्मी दत्त जोशी के अनुसार, खस वैदिक काल से पूर्व आर्य जाति की एक सशक्त शाखा थे, जो कश्मीर–नेपाल के हिमालयी क्षेत्र से उत्तराखंड पहुंचे।
पंडित पन्नालाल (Kumaon Customary Law, पृ. 10, सूची ‘A’) तथा डॉ. पातीराम (Garhwal – Ancient and Modern) के अनुसार भी गढ़वाल और कुमाऊँ के प्रमुख निवासी खस ही थे।
“हिन्दू कानून के धार्मिक सिद्धांतों से इनकी स्वतंत्रता मुख्यतः इस तथ्य से है कि खस लोग गंगा के मैदानों में बसने वाले भारतीय आर्यों के शक्तिशाली सांस्कृतिक विकास से अलग थे।”
— डॉ. लक्ष्मी दत्त जोशी, Khas Family Law (1929), पृष्ठ 311–312
खस समुदाय में ब्राह्मण, क्षत्रिय, दलित और अन्य उपसमुदाय सभी शामिल हैं। ऐतिहासिक रूप से यह शस्त्रजीवी–शासक समुदाय रहा है, और आज भी उन्हें “खस” या “खसिया” नाम से जाना जाता है। इनके त्यौहार, रीति-रिवाज, मान्यताएँ, बोली-भाषा तथा जीवन-पद्धति अब भी पारंपरिक स्वरूप में मौजूद हैं।
प्रकृति और वनों से गहरा नाता
खस जनजाति का जीवन वनों और प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। वे खेती, पशुपालन और दैनिक आवश्यकताओं के लिए वनों पर निर्भर रहते हैं। इनका जीवन पर्यावरण संरक्षण का आदर्श उदाहरण है। जंगलों में आग लगने पर पूरा समुदाय उसे बुझाने के लिए तत्पर हो जाता है। जलस्रोतों को गंदा करना या जंगलों में आग लगाना पाप माना जाता है।
देवी–देवता और आस्था
दुनिया के अन्य आदिवासी समुदायों की तरह, उत्तराखंड के खस लोगों की भी आस्था प्रकृति, पूर्वजों और लोक–देवताओं से जुड़ी है। ये लोग ग्वेल, नारसिंह, हरज्यू, सैमज्यू, गंगनाथ, नागनाथ, भोलनाथ, धौलीनाग, भूमियाँ, कोटगाड़ी माई, गड़देवी, नंदादेवी, बधाण, एड़ी, लाटू, छुरमल, महासू, हरू, और चौमू आदि देवताओं की पूजा करते हैं। देवी या देवता से आहूत व्यक्ति को “पश्वा” या “घोड़ा” कहा जाता है।
कुमाऊँ मंडल में ग्वेल देवता को न्याय का देवता माना जाता है। प्रशासन और न्यायालय से निराश व्यक्ति चितई (अल्मोड़ा) स्थित मंदिर या पाँखू (बागेश्वर) की कोटगाड़ी माई में मुकदमे के कागजात टाँगकर न्याय की याचना करता है।
परंपरागत उत्तराधिकार और रीति-रिवाज
खस समुदाय के अपने पारंपरिक टोटम हैं — कठपतिया, गोदना, ऐपण, और खतड़ुआ, जो अब त्योहार का रूप ले चुका है।
इनके उत्तराधिकार नियम अन्य हिंदू कानूनों से भिन्न रहे हैं। सौतिया बाँट प्रथा के अनुसार पति की संपत्ति पुत्रों में नहीं, बल्कि पत्नियों (सौतनों) में बाँटी जाती थी। जेठोंन प्रथा के अंतर्गत सबसे बड़े भाई को अतिरिक्त उपजाऊ भूमि या अन्य संपत्ति दी जाती थी।
मेले और त्यौहार
विश्व के अन्य जनजातीय समुदायों की तरह, उत्तराखंड का खस समुदाय भी प्रकृति का उपासक है। इनके अधिकांश त्योहार कृषि और ऋतु परिवर्तन से जुड़े हैं, जैसे फूलदेई, हरेला, घी संकरांत, खतड़ुआ, हलिया दशहरा, इगास, बग्वाल, रम्माण और हिलजात्रा। ये पर्व मुख्यधारा के पौराणिक उत्सवों से भिन्न हैं और उनकी जनजातीय परंपरा को प्रमाणित करते हैं।
पाँचवीं अनुसूची (5th Schedule)
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत पाँचवीं अनुसूची विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्रों और वहाँ के जनजातीय निवासियों के हितों की रक्षा के लिए बनाई गई है। इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों के प्रशासन, विकास, और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में जनजातीय भागीदारी सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह उनकी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और संवर्द्धन की व्यवस्था करती है।
पाँचवीं अनुसूची लागू होने के लाभ:
1. भू-कानून:
Tribe Status या पाँचवीं अनुसूची लागू होते ही देश का सबसे सख्त भू-कानून और मूलनिवास, 1950 की व्यवस्था स्वतः लागू हो जाएगी।
2. रोजगार:
केंद्र और राज्य सरकारों में शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण मिलेगा (केंद्र 7.5% एवं राज्य 50%) ।
PESA अधिनियम के अंतर्गत लगभग तीन लाख परिवारों को जल, जंगल और खनिज-संबंधी कार्यों से रोजगार प्राप्त होगा, तथा माइनर मिनरल के ठेके केवल स्थानीय लोगों को दिए जाएंगे।
3. भूमिहीन किसानों को भूमि:
भूमिहीन किसानों को Forest Rights Act 2006 के अंतर्गत 5 से 20 बीघा कृषि भूमि का आवंटन किया जा सकेगा, जैसा Lahaul and Spiti और Kinnaur में लागू है।
4. महिला सुरक्षा:
जनजातीय महिलाओं को ST Act के तहत विशेष कानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी।
5. शराबबंदी:
PESA अधिनियम 1996 की धारा 4(m)(ii) के अंतर्गत ग्रामसभा को मादक पदार्थों की बिक्री एवं खपत को नियंत्रित या पूर्णतः प्रतिबंधित करने का अधिकार प्राप्त होगा।
6. मजबूत ग्रामसभा:
ग्रामसभाओं को केंद्र और राज्य दोनों से विशेष निधि प्राप्त होगी। उन्हें अपने क्षेत्र में सामाजिक निर्णय लागू करने की संवैधानिक शक्ति मिलेगी।
7. भाषा एवं संस्कृति का संरक्षण:
गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषाओं को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिलेगा तथा शिक्षा संस्थानों में इन्हें पढ़ाया जाएगा।
8. वन्यजीव प्रबंधन:
वन्यजीवों के हमलों की स्थिति में वन विभाग को ग्रामसभा के निर्णय लागू करना अनिवार्य होगा। रैपिड रिस्पॉन्स टीम (RRT) के माध्यम से त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
9. परिसीमन:
उत्तराखंड में क्षेत्रफल-आधारित परिसीमन तभी व्यावहारिक हो सकेगा जब पर्वतीय समुदायों को संवैधानिक संरक्षण (Tribe Status) प्राप्त होगा। जिस प्रकार “परिसीमन अधिनियम, 2002” की धारा 10A के अंतर्गत पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल, असम, मणिपुर, नागालैंड) को विशेष प्रावधान प्रदान किए गए हैं, वैसा ही प्रावधान उत्तराखंड के लिए भी आवश्यक है।
10. देश की सुरक्षा:
Uttarakhand का पर्वतीय क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटा हुआ है, इसलिए यहाँ के मूल निवासियों की स्थायी उपस्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में पलायन के कारण सीमावर्ती गाँव तेजी से खाली हो रहे हैं, जो दीर्घकाल में देश की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
ऐसी स्थिति में 5th Schedule लागू होने से स्थानीय समुदायों को भूमि-अधिकार, रोजगार के अवसर और संसाधनों पर नियंत्रण मिलेगा। इससे न केवल पलायन पर रोक लगेगी, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्र पुनः आबाद और सशक्त होंगे, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
11. देश का “पानी का कुआँ” — जल-सुरक्षा और उत्तराखंड
उत्तराखंड भारत की प्रमुख नदियों गंगा, यमुना, अलकनंदा, मंदाकिनी, काली नदी, सरयू नदी और रामगंगा का उद्गम स्थल है, जो उत्तर भारत के करोड़ों लोगों की जल-आपूर्ति, कृषि और आजीविका का आधार हैं।
गंगा बेसिन अकेले देश की लगभग 40% आबादी को जल उपलब्ध कराता है, इसलिए इन स्रोत क्षेत्रों का संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता है।
स्थानीय समुदाय सदियों से इन जलागम क्षेत्रों के संरक्षक रहे हैं। यदि 5th Schedule लागू होती है, तो ग्राम सभाओं को वास्तविक नियंत्रण मिलेगा, जिससे अवैध खनन, प्रदूषण और अतिक्रमण पर प्रभावी रोक लगेगी तथा जल-संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
पाँचवीं अनुसूची उत्तराखंड में केवल अधिकारों की बहाली नहीं, बल्कि देश की जल-सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने का ठोस संवैधानिक उपाय है।

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