Uttrakhand

Pauri Garhwal में आदमखोर की दहशत..

” Tiger tiger burning bright…. ”
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आदमखोर की दहशत..

Kamal Singh Rawat

कहते हैं जब बाघ या गुलदार आदमखोर हो जाता है तो दस दस कोस की दूरी पर शिकार करता है,अब वो अपनी सल्तनत की सीमा से परे जाकर शिकार करता है। मानवमांस का नमकीन स्वाद उसके मुंह लग चुका होता है और असहाय,बुजुर्ग,बच्चे उसके आसान शिकार होते हैं। पलायन की मार से टुटे गांवों में अब यही निवासी हैं।वैसे भी हमारे पहाड़ी ग्रामीण समाज में वनपशुओं का सह अस्तित्व रहा है पर बाघ तो बाघ होता है।दहशत जारी है।
कहावत है —
“खाई त लाल खाब नि खाई त लाल खाब”।

…..हमारी इडवालस्युं पटटी – खंडाह घाटी पिछले छै पांच महिने से बाघ के आतंक से बुरी तरह प्रभावित है। कल ही सातवां व्यक्ति बाघ का निवाला बना है। दहशतपूर्ण साये में जीने को मजबूर हम करें तो क्या करें?

….. समझ नहीं आ रहा है कि इस रूडी वनाग्नि से बचें या आदमखोर से?वन विभाग के सुटेड बुटेड महिला पुरुष कर्मचारियों के तनाव दबाव ग्रस्त असहाय चेहरे ग्रामीणों में राहत और उम्मीद जगाने में असफल हैं। वैसे घसियारियां जंगल घास लेने जाती हैं तो सीटी उनके गले पर टंगी रहती हैं।बाघ झपटे तो आखिरी सीटी बजा कर अलर्ट करने के लिए। अलविदा कहने का अनोखा तरिका ईजाद हुआ है।
आदमखोर के चक्कर में कई निर्दोष बाघ पकड लिये गये हैं,एक दो टपका भी लिए गये हैं,फिर भी राहत नहीं मिली। वैसे वे पकडे हुए बाघ कहां हैं? जवाब निरूत्तर है।

….. सत्ताधारी दल मुंह सिये बैठे हैं।

वे बाघ भगाने पकड़ने को कब थाली घंटी बजाएंगे? मालुम नहीं। आजकल बड़े साहब के फरमान पर पैदल चल रहे हैं पर थर थर कांपती इडवालस्युं घाटी जो कभी इस मौसम में गुलजार रहती थी उससे बचकर,नाक में हाथ धर चल रहे हैं।डर के साथ बेशर्माई हमारे हिस्से आई है।

….. हम बाघ के हवाले हैं…..

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