“बंद कमरे से बाहर अपना अर्थ पाता है, इतिहास “
[ _इतिहास की सरहदें_ विषयक तीसरा क्रिएटिव हिस्ट्री व्याख्यान और परिसंवाद सम्पन्न]


Sanjay Kumar, Creative History
नयी दिल्ली, 10 मई 2026: “इतिहास की कोई सरहद नहीं होती। नया इतिहास हमेशा सरहदों के बाहर ही बना हैं। यह अजीब विडंबना हैं कि जब-जब इतिहास रुढ हुआ हैं, तब-तब एक नयी विचारधारा, सामूहिक आंदोलनों और एक नयी शैली (पद्धति) ने इतिहास को जकड़न से मुक्त किया हैं। एक नया इतिहास रचा हैं।” ये बातें 1857 की मई क्रांति दिवस के दिन 10 मई 2026 को दिल्ली के सेक्युलर हॉउस के सभागार में क्रिएटिव हिस्ट्री ट्रस्ट द्वारा समाजवादी शिक्षा संस्थान, रंगश्री, परम्परा/जेएनयू स्कॉलर ग्रुप और बक्सर स्कूल ऑफ़ हिस्ट्री के सौजन्य से आयोजित *तीसरे क्रिएटिव हिस्ट्री वार्षिक व्याख्यान 2026* में उभरकर आई। इस अवसर पर *तीसरे क्रिएटिव हिस्ट्री वार्षिक व्याख्यान 2026* देते हुए पत्रकार-इतिहासकार विवेक शुक्ल ने दिल्ली के स्थापत्या इतिहास का उल्लेख करते हुए कई ऐसे नामों की चर्चा की जिनसे दिल्ली का गौरवशाली इतिहास बना। उन्होंने दिल्ली के किताब दूकान की परम्परा, इमारतो के नक्शे, सड़क, पुल, कनॉट प्लेस, दरियागंज, विभाजन आदि के बनने की बारीकियों के इतिहास का उल्लेख किया और कहा कि “बिना इन छोटे-छोटे सन्दर्भ के किसी भी राष्ट्र या समाज का इतिहास पूरा नहीं होता हैं। ये सन्दर्भ इतिहास के बनने की प्रक्रियाओं की तरफ संकेत करते हैं। हो सकता हैं, इतिहासकार इन्हें इतिहास मानने से इंकार कर दें, पर ये भी इतिहास के जनक हैं।”
इस अवसर पर आयोजित *इतिहास की सरहदें* विषयक परिसंवाद में अपनी बात रखते हुए इतिहासकार सलिल मिश्र, रश्मि चौधरी, राजनीतिक समाजशास्त्री मणीन्द्र नाथ ठाकुर और लेखक अख़लाक़ अहमद आहन ने कहा कि इतिहास की कोई सरहद नहीं होती।एक बहुलतावादी संस्कृति, भाषा, विचार आदि की ऐतिहासिक यात्रा में बन रहे मोर्चा ने चीजों को खण्ड-खण्ड में बांटकर देखना शुरू किया। लेकिन इतिहास ने बताया कि अतीत को सिर्फ शासकों के नज़रिये से नहीं समझ सकते है, बल्कि जनता और जनसमूह के विचार भी इतिहास की सरहद तय करते हैं। इतिहास रोज बनता हैं, वह स्थिर नहीं होता है ; पर उसकी स्पष्ट रेखा पचास वर्ष बाद समझ में आती है।” कार्यक्रम की अध्याक्षता करते हुए इतिहासकार एस. एन. आर. रिज़वी ने कहां कि “विषय और विचार चीजों की सीमाओं को तय करते हैं।”
कार्यक्रम के पूर्व उदघाटन सत्र में इतिहासकार एस. एन. आर. रिज़वी की किताब *एक इतिहासकार की आत्मकथा*, रश्मि चौधरी और देवेंद्र चौबे की पुस्तक *इतिहास की सरहदें* और सोनिका भारती की किताब *डिअर इडियट, दिस इज लाइफ* का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत में अभिषेक पाण्डेय ने 1857 पर केंद्रित एक आदिवासी लोकगीत का पाठ किया और समापन सत्र में धीरेश तिवारी ने 1857 के नायक कुंवर सिंह पर केंद्रित नाटक *सुराज* के अंश का एकल मंचन किया। इतिहास केंद्रित व्याख्यान एवं परिसंवाद का संचालन किया युवा आलोचक अजय कुमार यादव ने और धन्यवाद दिया युवा अध्येता आशीष कुमार पाण्डेय ने।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य और इतिहास के अध्येताओं ने भाग लिया जिनमें शामिल थे अनिल कुमार सिंह, वेद प्रकाश सोनी, अदिति शरण प्रदीप कुमार, सुदर्शन लाल, सुशील कुमार, अशोक यादव, बृजभूषण चौबे, संजय कुमार, मीरा कुमारी, डॉ उज़्मा, देवेंद्र चौबे आदि शामिल थeI




