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चिपको आंदोलन की पहली रणनीतिक बैठक की 53वीं सालगिरह पर सर्वोदय केंद्र गोपेश्वर में गोष्टी।

गोपेश्वर, मंगलवार को चिपको आंदोलन की पहली रणनीतिक बैठक की 53वीं वर्षगांठ के अवसर पर चिपको की मातृ संस्था, दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल द्वारा “वर्तमान में पर्यावरण की चुनौतियाँ” विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया।

गोष्ठी में विचार व्यक्त करते हुए मनोज तिवारी ने कहा कि यह हम सभी के लिए गर्व की बात है कि 52 वर्ष पूर्व, 1 अप्रैल 1973 को, सर्वोदय केंद्र, गोपेश्वर में बमियाला गांव के तत्कालीन ग्राम प्रधान और स्वतंत्रता सेनानी स्व. बचन सिंह रावत की अध्यक्षता में दर्जनों गांवों के लोगों ने मंडल के जंगलों के बचाने के लिए चिपको आन्दोलन का निर्णय लिया था। इसी दिन पहली बार जिला अधिकारी चमोली के माध्यम से उतर प्रदेश सरकार को सर्वदलीय ज्ञापन सौंपा गया था जिसमें मंडल के जंगल में अंगु के पेड़ों की निलामी निरस्त कर पेड़ बचाने का निवेदन करते हुए चेतावनी दी गई थी कि जबरन पेड़ काटने की कोशिश की दशा में मंडल के जंगल में चिपको आंदोलन चलाया जाएगा। इस सर्वदलीय ज्ञापन में पहली बार चिपको आंदोलन को लिखित रूप में सरकार को प्रेषित किया गया था।जिसमें पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों पर अंग्वाल्टा लगा कर चिपको आंदोलन चलाने की चेतावनी दी गई थी। विधिवत रूप से इसी सर्वदलीय बैठक के बाद चिपको आंदोलन की नींव रखी पड़ी। इसी दिन मण्डल घाटी में साइमंड कंपनी द्वारा वनों के दोहन के विरोध में चिपको आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गई थी।

उन्होंने बताया कि जिसके बाद 24 अप्रैल 1973 को मण्डलघाटी के गोंडी में घाटी के तत्कालीन सभापति आलम सिंह बिष्ट की अध्यक्षता में पेड़ बचाने के लिए ग्रामीण जुटे। चिपको आंदोलन की यह पहली सभा हुई जिसमें दर्जनों गांवों के लोगों ने ढोल नगाड़ों के साथ पेड़ बचाने के लिए गौडी में जुटे। जहां मैदान में सभा की और मंडलघाटी के निलाम हो चुके ऐश अंगु के पेड़ों को बचाने में सफलता हासिल की। जन-दबाव के चलते मंडल के बाद केदारघाटी के रामपुर फाटा और दूसरे साल रैणी में वन कपटान से सरकार को पीछे हटना पड़ा।

यह मण्डल चिपको आंदोलन का प्रभाव ही था कि यह लहर केदार घाटी के रामपुर फाटा से होते हुए नीति घाटी के रैणी तक पहुँची, जिसके परिणामस्वरूप सरकार को जंगलों की नीलामी रद्द करनी पड़ी।

सी. पी. भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र के प्रबंध न्यासी, ओम प्रकाश भट्ट ने रैणी चिपको आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाली गौरा देवी सहित श्यामा देवी, इंदिरा देवी, पार्वती देवी, जयंती देवी, और जेठुली देवी को श्रद्धांजलि अर्पित की। और कहा कि साल 1973 में जब इस सुदूरवर्ती इलाकों में महिलाएं जब घर से बाहर‌ निकलने में भी हिचकती थी उस दौर में गोपेश्वर गांव की ये पांच बहिने तत्कालीन महिला मंगल दल की अध्यक्षा श्रीमती श्यामा देवी के नेतृत्व में दशोली ग्राम स्वराज मंडल‌ के मंत्री शिशुपालसिंह सिह के साथ दिसम्बर 1973 को गोपेश्वर से 90 किलोमीटर दूर केदारघाटी के रामपुर गांव में शीला के जंगलों को बचाने पहुंचे थे। वहां स्थानीय ग्रामीणों खासकर महिलाओं को संगठित कर पेड़ बचाने में सफल रहे थे।

गोष्ठी में उत्तराखंड आंदोलनकारी चंद्रकला बिष्ट ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को उस दौर की इन विभूतियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि गोपेश्वर गांव कि इन पांचों बहिने जो फाटा रामपुर चिपको आंदोलन में सक्रिय रही थीकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए गोपेश्वर वन पंचायत के क्षेत्र उनके नाम से वन क्षेत्र विकसित किया जाएगा।

सर्वोदय केंद्र में आयोजित इस गोष्ठी में चिपको की मातृ संस्था के संयुक्त मंत्री विनय सेमवाल, सुधीर चमोली, उमा देवी, कुंती चौहान, देवेश्वरी देवी, सावित्री बिष्ट, मंगला कोठियाल सहित कई समाजसेवी और पर्यावरण प्रेमी उपस्थित थे।

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