Uttrakhand

उत्तराखंड आंदोलन के एक युग का सूर्यास्त

DATARAM CHAMOLI

उत्तराखंड आंदोलनकारियों को एक साल के भीतर ही दूसरा बड़ा झटका लगा है। पहले त्रिवेन्द्र भाई गये तो अब दिवाकर भाई भी चले गये। उत्तराखंड में गाँधी के तौर पर लोकप्रिय रहे स्वर्गीय इन्द्रमणि बडोनी ने त्रिवेन्द्र पंवार को आंदोलन का हनुमान तो दिवाकर भट्ट को फील्ड मार्शल कहा था। त्रिवेन्द्र भाई के बारे में पहले लिख चुका हूँ। अब बात दिवाकर भाई की करूँ तो स्वर्गीय बडोनी जी ने उन्हें आंदोलन के फील्ड मार्शल का सम्मान यूँ ही नहीं दिया था, बल्कि इसके खास मायने हैं। स्वर्गीय बडोनी अच्छी तरह जानते थे कि दिवाकर में अपने नाम के अनुरूप वह तीव्र तेज है, जो राज्य आंदोलन को सदैव प्रकाशमान रखेगा। वास्तव में आंदोलन जब-जब कमजोर पड़ा, तब-तब दिवाकर भट्ट ने इसे नई ऊर्जा देने का काम किया।

दिवाकर भट्ट को बहुत छोटी उम्र में ही अहसास हो गया था कि विकास के लिए उत्तराखंड राज्य बहुत जरूरी है, लिहाजा वे पूरी शक्ति के साथ आंदोलन में जुट गये थे। वे एक कुशल संगठनकर्ता और ओजस्वी वक्ता थे। राज्य आंदोलन के दौरान उन्होंने कई दिनों तक उपवास किये। जेल यात्राएं की, जगह-जगह पुलिस के लाठी-डंडे खाए। यहाँ तक कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ रासुका लगा दी थी। उन्हें देखते ही गोली मारने के आदेश थे, लेकिन वे इस सबसे जरा भी विचलित नहीं हुए और निरंतर राज्य निर्माण की राह पर चलते रहे।

राज्य आंदोलन में उनके ऐतिहासिक योगदान को पूरी दुनिया जानती है, लेकिन नई पीढ़ी को यह भी मालूम होना चाहिए कि विश्वविद्यालय आंदोलन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे बताते थे कि इस आंदोलन के दौरान “जब तक न खुलें शिक्षा के द्वार, बंद रहेंगे बदरी-केदार”, का नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने न केवल राज्य आंदोलन में लाठियां खाई, बल्कि एक बार श्रीनगर में अंशकालिक शिक्षकों के लिए भी उन्होंने जबर्दस्त लाठियां खाई थी। उस समय एक सड़क दुर्घटना में उनके शरीर की हड्डी-पसलियाँ टूटी हुई थी, जिन पर पुलिस ने जमकर लाठी प्रहार किया तो उनकी हालत बिगड़ गई थी। कई बार की भूख हड़तालों और लाठी प्रहारों से उनके शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ा, लेकिन उनकी इच्छा शक्ति इतनी मजबूत थी कि वे कभी भी विचलित नहीं हुए और निरंतर आंदोलन में जुटे रहे।
सामाज के प्रति दायित्वबोध की भावना उनके भीतर बहुत गहरी थी। जब वे युवा थे, तो कहीं भी कोई बस दुर्घटना या आपदा की खबर लगती थी, तो तत्काल लोगों की सहायता के लिए वहाँ पहुंच जाते थे। अक्सर लोग लोग यहाँ तक कहते थे कि कायदे से इस सेवा के लिए उन्हें राष्ट्रपति पदक मिलना चाहिए था। उत्तराखंड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता के लिए उन्होंने तरुण हिमालय जैसी संस्थाएं बनाई। बीएचईएल में उन्होंने वर्षों तक कर्मचारियों का नेतृत्व किया। उनके सम्मान की लड़ाई लड़ी। रामलीलाओं के आयोजन में उनकी खास दिलचस्पी रही। वे रामलीलाओं में अभिनय भी करते थे। 1989 के दौरान राज्य आंदोलन पर निकली एक कैसेट में उनके लिखे गीत भी थे।

दिवाकर भट्ट आंदोलन के प्रतिष्ठित स्तंभ ही नहीं, बल्कि एक दिग्गज राजनेता भी थे। 1980 में देवप्रयाग विधानसभा का चुनाव वे जीतते-जीतते भी हार गये थे। तब उक्रांद का चुनाव चिन्ह उगता हुआ सूरज था। कीर्तिनगर ब्लॉक के प्रमुख के तौर पर उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी। अधिकारियों को अहसास कराया कि पंचायतों के प्रतिनिधियों को गंभीरता से लेना सीखें। एक बार तो उन्होंने ऐसा आंदोलन खड़ा किया कि एसडीएम को अपनी गलती के लिए जनता के सामने आकर सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी पड़ी थी। उन्होंने उक्रांद का बड़ी कुशलता से नेतृत्व किया तथा निरंतर उक्रांद के टिकट पर देवप्रयाग से चुनाव लड़ते रहे। वर्ष 2007 में वे विधायक और मंत्री भी बने।

वर्ष 1985 से लेकर 2007 तक मैं बराबर उनके संपर्क में रहा। जब वे दिल्ली आते थे तो उक्रांद के तत्कालीन दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष खिमानंद खुल्वे, स्वर्गीय बचन सिंह धनौला और मुझे अवश्य मिलते थे। एक बार वे खैट पर्वत पर अनशन के दौरान जंतर-मंतर पर आए, उनकी खराब स्थिति को देखकर मैं उनसे दूर ही रहता था कि यदि वे मुझसे बोलेंगे तो उनकी ऊर्जा नष्ट होगी। एक दिन उनसे नहीं रहा गया और उन्होंने मित्रों से कहा कि उसे कहो कि मेरे पास आए। मैंने कहा कि आप ज्यादा बोल रहें जो आपके लिए ठीक नहीं है। इस पर उन्होंने कहा कि “आंदोलन के साथियों से बोलेंगे नहीं तो काम कैसे चलेगा। यदि सरकार सम्मानजनक तरीके आंदोलनकारियों से वार्ता नहीं करेगी तो फिर मैं यहाँ दिल्ली में अपना अनशन नहीं तोडूँगा, मैं वापस खैट पर जाकर अनशन जारी रखूँगा। तू मीडिया को मेरी इन भावनाओं से अवगत करा देना कि मैं बिना मान के अमृत पीने के बजाय खैट पर जाकर दम तोड़ना उचित समझूँगा।”

राज्य गठन के बाद भी उनसे मुलाकातें होती रही, लेकिन वर्ष 2007 में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद वे अपना दायित्व निभाने में व्यस्त हो गए और मैं अपनी नौकरी संभालने में जुट गया। वर्ष 2011 में ज्योतिष्पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज ने मुझसे कहा कि मेरे साथ बडियारगढ़ चलिए। दरअसल घंडियाल देवता की जात में शंकराचार्य जी को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था। मैं चाहकर भी शंकराचार्य जी की बात नहीं टाल पाया और उनके साथ दिल्ली से घंडियालधार चला गया। हमारे साथ राज्य आंदोलनकारी पंचम सिंह रावत भी थे। घंडियालधार में दिवाकर भाई से संक्षिप्त मुलाकात हुई थी। इसके बाद फिर कई साल तक उनसे मिलना संभव नहीं हो पाया। कारण कि मैं जीवन संघर्ष में उलझा रहा। कभी नौकरियाँ छूटी तो महीनों तक सड़क पर भटकना पड़ा, तो कभी छोटी-मोटी नौकरियों में छुट्टियाँ नहीं मिल पाती थी।

वर्ष 2022 में उन्होंने मुझसे संपर्क साधा और कहा कि तूने एक राज्य आंदोलनकारी होने के नाते हमेशा मेरा साथ दिया, तो इस बार भी साथ दे देता तो मुझे अच्छा लगता। यह मेरा अंतिम चुनाव है। मैंने कहा कि भाई साहब अभी करीब तीन महीने सड़क पर रहने के बाद बड़ी मुश्किल से 1 दिसंबर 2021 को नई नौकरी मिली है, अगर यह मौका भी छोड़ दिया, तो फिर क्या करूँगा। मैंने पूरी तरह असमर्थता जताई कि क्षमा करें अब आंदोलनकारी होने का धर्म नहीं निभा पाऊँगा क्योंकि अब पहले जैसे हालात नहीं रहे। अब मैं नौकरी नहीं छोड़ सकता। उन्होंने खासकर शिवानंद भाई साहब (शिवानंद चमोली) और कई अन्य आंदोलनकारी मित्रों के माध्यम से भी मुझे समझाने का प्रयास किया, लेकिन मेरी विवशता आड़े आ रही थी। खैर, वे अच्छी तरह चुनाव लड़े, मगर जीतते-जीतते भी अपना अंतिम चुनाव हार गये। इसका उन्हें दुख होना स्वाभाविक था। नाराजगी में उन्होंने मुझसे बातचीत नहीं की, गुस्से में मैंने भी यह कहकर दूरियाँ बढ़ा ली कि आखिर मैं तुम्हारे चुनाव में आ भी जाता तो कौन सा तीर मार लेता? क्या मैं मोदी जी जैसा चमत्कारी व्यक्तित्व हूँ? लंबे समय के बाद जब उन्हें मेरी बात समझ में आ गई तो इधर पिछले करीब दो साल से दूरभाष पर संवाद का सिलसिला फिर शुरू हो गया था। उनका स्वास्थ्य खराब था, तो कभी-कभार गाँव से दिल्ली लौटते वक्त मैं हरिद्वार में उनसे मिलने भी चला जाता था। मुलाकात के दौरान वे पुरानी यादों में चले जाते थे। आंदोलन के पुराने दिन और पुराने साथी उन्हें बहुत याद आने लगे थे। शायद जीवन के अंतिम दिनों में अतीत की यादें सजीव हो जाती हैं।

एक बार मैं डॉक्टर मुकेश पंत के साथ भी उनसे मिलने गया। तब वे बहुत भावुक हो गये थे। उन्होंने बताया था कि बाथरूम में गिरने से चोट लग गई थी। मुझे उनकी हालत देखकर बहुत दुख होता था कि जिस इंसान के चारों ओर कभी लोगों का जमघट लगा रहता था, उसे उम्र के चौथे पड़ाव में एकदम अकेलापन झेलना पड़ रहा है। कभी-कभार अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर बेशक कुछ पल के लिए कुछ लोग उनके पास पहुंचकर फोटो खिंचवाकर या सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते थे, लेकिन इससे उनका अकेलापन भला कैसे दूर हो पाता।

बहरहाल दिवाकर भट्ट आंदोलन के ऐसे सूर्य थे जिनके अस्त होने से आंदोलन के एक युग का अंत हो गया है। इस सूर्यास्त के बाद चारों ओर शोकरूपी अंधकार छाया हुआ है। दिवाकर भट्ट का निधन राज्य की जनता के लिए अपूरणीय क्षति है। फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि एक दिन पौ फटेगी और राज्य में फिर से सूर्योदय होगा। फिलहाल दिवाकर भट्ट को सादर श्रद्धा सुमन।

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