Uttrakhand

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता जे.एस. रावत का उत्तराखंड राज्य सरकार को संबोधित खुला संवैधानिक पत्र

हाल के दिनों में Ankita Bhandari प्रकरण को लेकर हुए व्यापक जन-आंदोलन तथा अब एक कथित “VIP” के नाम के सार्वजनिक विमर्श में आने के पश्चात, यह आवश्यक हो गया है कि उत्तराखंड राज्य सरकार को उसके संवैधानिक दायित्वों की स्पष्ट और निर्भीक स्मृति दिलाई जाए।

यह कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं रह गया है। यह वह क्षण है जब राज्य की शासन-निष्ठा,उसकी निष्पक्षता और उसकी संवैधानिक आत्मा—तीनों जनता के सामने कठघरे में हैं। जन-आंदोलन तब जन्म लेते हैं जब नागरिकों को यह अनुभव होता है कि न्याय की प्रक्रिया या तो कमजोर पड़ रही है या प्रभावशाली शक्तियों के आगे झुक रही है। ऐसे में सरकार का कर्तव्य है कि वह असहमति को दबाने के बजाय, उसकी वैधानिक जड़ों को संबोधित करे।

राज्य सरकार को यह स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि शांतिपूर्ण विरोध कोई अपराध नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है। विरोध कर रहे नागरिकों को “कानून-व्यवस्था की समस्या” के रूप में देखना, स्वयं संविधान की भावना के विपरीत है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर यदि नागरिक अधिकारों का दमन किया जाता है, तो यह शासन की मजबूती नहीं, बल्कि उसकी नैतिक कमजोरी का संकेत होता है।

यह भी उतना ही स्पष्ट कहा जाना आवश्यक है कि कानून का शासन किसी भी प्रकार की ‘VIP संस्कृति’ से ऊपर है। यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के विरुद्ध संदेह या आरोप सामने आते हैं, तो राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वह जांच को न केवल निष्पक्ष बनाए, बल्कि उसे पूरी तरह स्वतंत्र, पारदर्शी और सार्वजनिक विश्वास के योग्य भी बनाए। किसी भी स्तर पर संरक्षण, विलंब या चयनात्मक कार्रवाई—न्याय के साथ घोर विश्वासघात होगी।

Uttarakhand सरकार का दायित्व केवल प्रशासन चलाना नहीं है; उसका प्राथमिक कर्तव्य नागरिकों के जीवन, गरिमा और विश्वास की रक्षा करना है। अनुच्छेद 21 राज्य पर यह सकारात्मक दायित्व डालता है कि वह न्याय की प्रक्रिया को प्रभावी बनाए—विशेषकर तब, जब पीड़ित पक्ष और समाज, दोनों न्याय की प्रतीक्षा में हों।

इतिहास साक्षी है कि जो राज्य कठिन समय में संस्थागत साहस दिखाते हैं—वे ही दीर्घकाल में जनता का विश्वास अर्जित करते हैं। कानून को उसका स्वाभाविक मार्ग तय करने देना, चाहे वह मार्ग सत्ता के लिए कितना ही असुविधाजनक क्यों न हो, यही सच्चा संवैधानिक शासन है।

आज यह पत्र किसी टकराव के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक आत्मचिंतन के लिए लिखा गया है। सरकार का आज का आचरण यह तय करेगा कि उत्तराखंड में राज्य को न्याय का संरक्षक माना जाएगा या केवल सत्ता का संरक्षक।

न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए—उसे निर्भीकता, निष्पक्षता और पूर्ण पारदर्शिता के साथ होते हुए दिखना भी चाहिए।

J S Rawat,
Advocate,
Supreme Court of India
New Delhi

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