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अखबारों की मौत हो रही है और न्यूज चैनल लकवाग्रस्त हैं

सोशल मीडिया ने मेनस्ट्रीम मीडिया को हाशिए पर धकेल दिया है। - अगले कुछ वर्षों में कहीं गुम हो जाएगा मेनस्ट्रीम मीडिया

गुणानंद जखमोला
वरिष्ठ पत्रकार

अखबारों की मौत हो रही है और न्यूज चैनल लकवाग्रस्त हैं
– सोशल मीडिया ने मेनस्ट्रीम मीडिया को हाशिए पर धकेल दिया है।
– अगले कुछ वर्षों में कहीं गुम हो जाएगा मेनस्ट्रीम मीडिया

2009 की बात है। दिल्ली में टाइम्स हाउस में हमारे तत्कालीन एक्सीक्यूटिव एडिटर और प्रख्यात पत्रकार मधुसूदन आनंद जी कहने लगे, 2040 तक दुनिया के सभी अखबार बंद हो जाएंगे। उनकी बात सुनकर मैं मन ही मन हंस रहा था। उस दौर में इलेक्ट्रानिक मीडिया तेजी से बढ़ा था, इसके बावजूद वह विज्ञापन बाजार पर महज 42 प्रतिशत ही कब्जा कर सका था। मुझे लगता था कि मधुसूदन आनंद जी का यह कथन अतिश्योक्ति है। संभवतः उन्होंने इस संबंध में बाद में एक आर्टिकल भी लिखा।

कुछ दिन पहले वाशिंगटन पोस्ट में छंटनी हुई। 300 पत्रकार निकाल दिये गये। इंटरनेशनल ब्यूरो बंद कर दिया गया और संभवतः डेस्क भी खत्म कर दिया गया। कोरोना काल में कई अखबार और पत्र-पत्रिकाएं धड़ाधड़ बंद हुई। सहारा जैसा ़ग्रुप ने एक दिन में ही अपने सात एडिशन बंद कर बैठ गया। एनडीटीवी से लेकर अधिकांश टीवी चैनल घाटे में चल रहे हैं। कई चैनल तो पत्रकारों को वेतन नहीं दे पा रहे हैं। दैनिक भास्कर, जागरण और अमर उजाला पढ़ने के लिए पाठक नहीं मिल रहे हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद प्रसार संख्या गिर रही है। ऐसे में लगता है कि मधूसूदन सर का कथन सच साबित हो रहा है। 2040 से भी पहले अखबारों की मौत हो जाएगी और टीवी चैनल देखना लोग बंद ही कर चुके हैं।

टीवी चैनल और अखबार अपना विश्वास खो चुके हैं। परसों देहरादून में कांग्रेस ने लोकभवन घिराव किया। अच्छी-खासी भीड़ थी, लेकिन अखबार-चैनलों में इसे अधिक तवज्जो नहीं मिली। कुछ मीडिया हाउस तो सरकार का भोंपू बने हुए हें और कांग्रेस के अंकिता भंडारी मर्डर प्रकरण में वीआईपी का नाम उजागर करने को कांउटर करने के लिए मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मुद्दे को तूल दे रहे हैं। ऐसे ही बजट सत्र में लोकसभा में राष्ट्रपति का अभिभाषण पीएम के कथन के बिना ही हो गया, किसी ने खबर नहीं दी। सोशल मीडिया पर यह खबर छायी रही। राहुल गांधी के पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे का मुद्दा भी ऐसे ही रहा। सोशल मीडिया अब न्यूज चैनलों पर डोमिनेट कर रहा है। उत्तराखंड के कोटद्वार के मोहम्मद दीपक प्रकरण में प्रख्यात पत्रकार अजीत अंजुम के एएसपी वाला इंटरव्यू दो करोड़ लोगों ने देखा।

यदि वाशिंगटन पोस्ट इस तरह से धड़ाम हो सकता है तो बाकी भारतीय अखबारों की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अब डिजिटल युग है। ऐसे में पत्रकारिता के स्टूडेंट्स को समझना होगा कि आखिर वह कैसी पत्रकारिता करना चाहते हैं और करेंगे क्या? प्रिंट मीडिया की देर-सबेर मौत हो जाएगी और इलेक्ट्रानिक मीडिया लकवाग्रस्त हो गया है। अब इनके लिए बहुत लंबा समय नहीं बचा है। इसलिए मीडिया के क्षेत्र में आने वाले बच्चों को सोच-समझ कर ही इस क्षेत्र में कदम रखने होंगे।

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